मोहनदास करमचंद गाँधीजी को ये देश युगपुरुष, महात्मा, और बापू तो बना लिया लेकिन इस देश को पूर्ण स्वराज्य, पूर्ण आजादी नहीं दिला पाये, येसा गाँधीजी ही मानते थे, चरखा कात कर स्वदेशी का नारा देने वाले गाँधीजी के टूटे दिल के दिये की ज्योति तो वैसे ही डगमगा रही थी की काल की आँधी के ऐक झोके ने पूरी तरह बुझा दिया देश बहुत रोया और आज भी रो रहा है, देश के चाचाओ ने गाँधीजी को देश के चोराहो से लेकर नोटों तक बिठा कर उनके सपनो का खून किया, उनके आदर्शो को रोंद डाला, उनकी आत्मा (चरखा) तक को देश के किसी संग्रहालय में पंहुचा दिया देश का वो हाल कर दिया कि गाँधीजी खुद को इस देश में ढूढ़ते रह जायेगे लेकिन ? ख़ैर कल ये देश आपको देश का अन्ना(बड़ा भाई) भले ही बनाले आम आदमी का हाँथ तो फिर भी खाली रहेगा क्युकी श्री अन्नाहजारे जी आप, जहाँ आकर समस्याए ख़त्म होती है वहां से आपने लड़ाई कि सुरुआत कि है दुसरे शब्दों में कहा जाय तो देश कि समस्याओ के बट ब्रिक्ष के समूचे पेड़ से एक टहनी तोड़ने कि कोशिश कर रहे है और आप जानते ही नहीं मानते भी है कि इससे ६५% तक भ्रष्टाचार ख़त्म होगा, आप भ्रष्टाचारी को सजा दिलाने कि बात कर रहे है जिसके लिए लोकपाल बिल चाहते है लेकिन देश कि समस्या भ्रष्टाचारी नहीं भ्रष्टाचार है जो देश कि लगभग १०० समस्याओ कि एक पूरक समस्या इसको और साफ शब्दों में कहे तो देश कि समस्याओ को एक बट ब्रिक्ष मान लिया जाय तो "कालाधन इस ब्रिक्ष कि जड़े है और उसकी बेले जो टहनियो से जमीन तक लटकी रहती है वो है काले धन का श्रोत, इस ब्रिक्ष का तना है इस देश कि ब्यवस्था और टहनी फूल पत्ते सभी है इसके पोषक काले अंग्रेज अब आप सोचिये अपने अभियान के बारे में ? सो श्री अन्नाहजारे जी एक बार फिर सोचिये और देश कि समस्याओ के बट ब्रिक्ष को जड़ से उखाड़ने का संकक्ल्प लीजिये |ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम
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