"श्री अन्नाहाजारेजी" के स्वस्थ रहने कि कामना करते हुए इस्वर से प्रार्थना है कि उन्हें लम्बी उम्र प्रदान करे क्युकि "गाँधीवादी" देश में बहुत कम ही बचे है, ये और बात है कि उनकी मुर्तियो पर मालाये चड़ा कर उनके आदर्शो का खून करने वालो का ही आज बोलबाला है, हो सकता है मेरी सोच गलत हो, वैसे दिल से मै भी चाहता हु की मेरी सोच गलत हो लेकिन आंदोलनों के इतिहास को अतीत में जब भी पलट कर देखते है तो साफ दीखता है कि हमेसा यही हुआ है जो आज हो रहा है, बहुत पीछे १६०० के ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी से लेकर फ़्रांसिसी, प्लासी, टीपू सुल्तान, मराठा, और सिख, युद्ध के पन्ने पलटकर देखे तो, तब भी यही हुआ था जो आज हो रहा है, लेकिन १८५७ कि हकीकत बताने वाले हर घर में अपने पिता द्वारा बताये तथ्यों के जानने वाले होगे, भारतीय स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम १८५७ जिसने अंग्रेजो को अंदर तक हिला कर रख दिया था, अंग्रेजो को उनका सूर्यास्त लगने लगा था इस आन्दोलन कि तिन मुख्य विशेसताये थी पहला ये आन्दोलन अहिंसावादी सत्याग्रह नहीं, सशस्त्र बिद्रोह था, दूसरा पुरे भारतीय उपमहाद्वीप में एक साथ सुरु हुआ था, तीसरा नेत्रित्व से लेकर आर्थिक ब्यवस्था तक सब कुछ क्रान्तिकारियो के हाथो हुआ था जो आम आदमी थे, १८५७ का भारतीय विद्रोह के पांच मुख्य कारण थे राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक, सैनिक तथा सामाजिक (ब्यवस्था) लेकिन बहुत दुःख होता है जान कर कि जिन कारणों को लेकर इतनी बड़ी क्रांति हुई उन्ही कारणों को लेकर असफलता हाँथ लगी और अगले ९० सालो तक गोरे अंग्रेज हम पर अत्याचार करने में कामयाब रहे, असफलता के कारणों को थोडा बिस्तार से लिखना चाहता हु क्युकि तभी आप १८५७ और २०११ कि समानता को समझ पायेगे, पहला राजनैतिक:- क्रान्तिकारियो और बिद्रोहियो के मकसद एक होते हुए भी तथाकथित नायको (न क्रन्तिकारी थे और नहीं ही बिद्रोही थे) के "मुद्दे" अलग अलग थे, जैसा कि आज २०११ में है, दूसरा आर्थिक;- काले अंग्रेज (गोरे तो करने से रहे) पुजीपतियो ने एक रूपये कि मदत नहीं कि बल्कि गोरो के साथ मिलकर क्रांति का दमन करने में पूरी ताकत झोक दी क्युकि बिद्रोह में उन्हें अपना आर्थिक नुकसान दिखाई दे रहा था, जो आज २०११ में भी हो रहा है, तीसरा धार्मिक:- गोरो द्वारा सभी धार्मिक आस्थाओ पर चोट पहुचाने के कारण क्रांति हुई लेकिन "फूट डालो राज्य करो" के सिधांत को लागु करने में धर्म ही गोरो का सबसे बड़ा हथियार बना, जो आज २०११ में भी हो रहा है, चौथा सैनिक:- सिपहिओ और सैनिको में उठे बिद्रोह को सबसे ज्यादा उनके अधिकारिओ ने दबाया जो गोरो से ज्यादा काले थे, २०११ में भी वही हो रहा है किसानो के भूमि अधिग्रहण से लेकर रामलीला मैदान तक लाठिया और गोलिया चला रहे लोग और चलवाने वाले हमारे अपने ही काले अंग्रेज है हमारे लिए आन्दोलन करने से तो रहे हां घाव पर नमक छिडकने के लिए साथ बैठ कर नमक रोटी खाकर फोटो खिचवाने जरुर आ जाते है, पांचवा सामाजिक (ब्यवस्था):- गोरो द्वारा स्थापित ब्यवस्था दमनकारी, सोसनकारी तथा पुरे सामाजिक ढाचे को नष्ट कर देने वाली थी १८५७ का क्रन्तिकारी बिद्रोह मूलतया ब्यवस्था परिवर्तन को लेकर ही हुआ था लेकिन बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि आज तक हम उसी ब्यवस्था में जी रहे है यहाँ तक कि पूरी कि पूरी सबैधानिक ब्यवस्था १८५७ से लेकर १९४७ के बिच प्रतिपादित और स्थापित कि हुई है जिसका मकसद ही पूजीवादी अर्थतंत्र को पोषित और सुरछित रखना था जिसे आज २०११ में हम तथाकथित लोकतंत्र कहते है
आज भी हमारी लड़ाई पूरी कि पूरी ब्यवस्था परिवर्तन को लेकर होनी चाहिए लेकिन एक अनुच्छेद, तथा कुछेक कड़े कानून को बनाकर हम क्या कर लेगे, पूजीवादी अर्थतंत्र द्वारा उत्पादित "कालेधन" कि ताकत जब तक भ्र्स्ताचारियो, देशद्रोहियो, के हाँथ में है, तब तक आदमी का हाँथ खाली ही रहेगा जिस काले धन के बल पर पूरे लोकतंत्र को बंधक बना कर रक्खा है उसी काले धन से लोकपाल को भी बड़ी आसानी से खरीद लेगे, लोकपाल बिल पर "गाँधीवादी" "श्री अन्नाहाजारेजी" कि लड़ाई उतनी ही निरर्थक है जितनी "श्री महात्मा गांधीजी" द्वारा स्वीकृत १९४७ कि स्वतंत्रता
देश के काले अंग्रेज कांग्रेसियो ने १२७ साल गोरे अंग्रेजो के बगल में बैठ कर के कूटनीति सीखी है, १८८५ में स्थापित कांग्रेस और गोरो कि नीतिओ कि समानता आम आदमी और क्रान्तिकारियो को समझ में आने लगा था तभी कांग्रेसियो ने १९२१ में गांधीजी को आगे करके कांग्रेस कि कमान सौप दी गांधीजी युगपुरुष तो थे ही उनकी देव वाणी पूरा देश सुनने लगा लेकिन सबसे दुखद बात है कि गांधीजी द्वारा संकल्पित सौ वादों (नारी उत्थान, ब्यवस्था परिवर्तन, साकाहार, गोरक्षा, भाषा, सिक्छा, स्वास्थ इत्यादि) में से एक वादा भी आज तक पूरा नहीं किया सिर्फ और सिर्फ उनके ब्यक्तित्व का इस्तेमाल किया ख़ैर एक बार फिर कांग्रेस को एक और गाँधी कि जरुरत महसूस हुई, जब २००७ से लेकर २०११ तक भ्रस्ताचार और घोटाला कि बाढ़ आ गई उधर बाबारामदेव ने गांधीजी द्वारा संकल्पित सभी वादों को मुद्दा बनाकर कालेधन भ्रस्ताचार, और दूषित ब्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेकने के लिए कमर कश कर खड़े हो गए तो बैठे बिठाये गाँधीवादी "श्री अन्नाहजारेजी" कांग्रेस के हाथो में गांधीजी कि लाठी बन कर आ गए, ब्यक्तित्व एक बार फिर जित गया, आम आदमी का "मुद्दा" हार गया, देश को एक और गाँधी भले ही मिल गया हो लेकिन आजादी और गांधीजी के सपनों का रामराज्य कुछ दूर और खिसक गया
ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम