आज़ादी की दूसरी लड़ाई(?)....शीषर्क से लिखा नगेश कुमार नेहरा का लेख तात्कालिक परिस्थितियो, पात्रो, और घटनाओ को आधार मान कर प्रथम दृष्टया काफी अच्छा है लेकिन दृष्टिकोण गलत है, "कांग्रेस" और "गांधीजी" को अलग कर के देखना ही दिन के दोपहर में आंख बंद करके चाँदनी रात की अनुभूति करने जैसा है, "कांग्रेस" के बिना "गांधीजी" और "गांधीजी" के बिना "कांग्रेस" की परिकल्पना करना ही असम्भव है, "कांग्रेस" की यु. पि. ये. सरकार और "गाँधीवादी" श्री अन्नाहजारेजी दोनों एक दुसरे के पूरक एवं एक ही सिक्के के दो पहलु है, कहते है इतिहास हमेसा खुद को दोहराता है, एक बार फिर १९१७ से १९४७ के तिन दसक का इतिहास लिखा जाने वाला है, यदि समय रहते आम आदमी को बात समझ में नहीं आई तो २०१४ में वर्णशंकर के "युवराज" की ताजपोशी एक "गाँधीवादी" के हाथो देखना देश की मज़बूरी बन जाएगी, क्युकि पूंजीपतियो, कालेधनकुबेरों, और देशद्रोहियो ने "चक्रब्यूह" कि संरचना कर दी है, आम आदमी कि आशाएं और देश हित रूपी "अभिमन्यु" को कर्ण, क्रिपाचार्य, और द्रोणाचार्य रूपी "कार्यपालिका" के घेरे में लेकर भीष्म रूपी "बिधयाका" के सहयोग और समर्थन से "अश्वस्थामा" रूपी "पूंजीपतियो, कालेधनकुबेरों, और देशद्रोहियो" द्वारा एक बार फिर मार दिया जायेगा और संजय रूपी "पूंजीपतियो, कालेधनकुबेरों, और देशद्रोहियो" कि डुगडुगी "मीडिया" ध्रितराष्ट्र रूपी "न्यायपालिका" को संसोधित परिद्रिस्य दिखा कर गुमराह करता रहेगा, ख़ैर जो भी हो आम आदमियो को अपने हितो कि रक्छा खुद साहस, धैर्य, एकता, और विवेक से किसी आक्रामक, क्रांतिदूत, सम्पूर्ण ब्यवस्था परिवर्तन, पूर्ण स्वराज्य, के लिए कटिबद्ध को आगे करके लड़ना होगा, चलते चलते एक सवाल आपसे, क्या १९४७ में हम आजाद हुए थे ? यदि हाँ तो कोई बात नहीं, बस मुझे माफ करना, और यदि नहीं तो एक बार फिर १९१५ से १९४७ का इतिहास पढना तथा उस दौरान हुई गलतियो को मत दोहराना | ॐ बंदेमातरम जयहिंद
ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम
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