मनमोहन मिश्र

मनमोहन मिश्र
"राजनैतिक विश्लेषक"

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

"खेल सोनिया मैडम और अन्ना हजारे का"

१० जनपथ रोड (सोनिया मैडम के घर) पर एक प्रतियोगिता आयोजित की गई है "कौन बनेगा प्रधानमंत्री" और खेल है सतरंज का, एक तरफ के हाट सिट बैठकर सोनिया मैडम मनमोहन सिंग (राजा) सहित सारे मंत्रिमंडल को गोटियो की जगह सजा रक्खा है, प्रधानमंत्री की ख्वाहिश रखने वाले सभी मंत्रियो को क्रमशः "वजीर" (प्रणव मुखर्जी) "हांथी" (चिदम्बरम और शरद पवार) "घोड़े" कपिल सिब्बल और पवन कुमार बंसल) "ऊंट" (बिलास राव देशमुख और सलमान खुर्शीद) और "प्यादों" के खानों में (राजा, कलमाड़ी, कनिमोझी, दयानिधि, थरूर, सिंदे, इत्यादि) सजा रक्खा है इस सतरंज के खेल की सबसे दिलचस्प बात है कि खेल तो सात साल से सुरु है लेकिन अभी तक सामने वाली हाट सिट के लिए खिलाडी ही तय नहीं हो पाया है उस पर बैठने के लिए अंतरिम प्रतियोगिता जारी है, सोनिया मैडम ने सर्त लगा रक्खी है "पहले जो सबसे अधिक हमारी तरफ के "वजीर" से लेकर "प्यादों" तक को मारेगा (बाहर करेगा) वही हाट सिट पर बैठेगा और पूरा "बिपक्छ" बेचारा कभी आपस में तो कभी मैडम के "प्यादों" पर हमले में लगा है हाँ कुछ "प्यादों" को आउट भी किया है लेकिन इससे क्या होगा और इस खेल में "बिपक्छ" कि सबसे बड़ी मज़बूरी है मैडम कि धमकी "जो हमारे प्यादों पर हमला नहीं करेगा उसे अमरसिंह कि तरह सी बी आई से बोल कर अन्दर करवा दूंगी" कहने के लिए तो सारी लड़ाई "राजा" (मनमोहन सिंह) को बचाने के लिये है लेकिन "बली" के सबसे बड़े और अंतिम बकरे तो वही है ख़ैर कुछ बाते संछेप में बता देता हु, सवाल-सतरंज का ये खेल क्यों ? उत्तर-राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए बिपक्छ के हांथो अपने ही मंत्रियो (प्रधानमंत्री के बड़े दावेदारों और सहयोगी पार्टियो के मंत्रियो) को रास्ते से हटवाना या कमजोर करना, अब अगर उपरोक्त सारे खेल के खेल को सीधे शब्दों में कहा जाय तो सभी कांग्रेसी और यु पि ए का हर मंत्री, प्रधानमंत्री सहित सभी प्रत्यक्छ या परोक्छ घोटाले किये है या सामिल है और घोटालो का सबसे बड़ा हिस्सा १० जनपथ सीधे या घुमाकर राबर्ट इत्यादि से होते हुए गया है, कुछ सामने आ चूका है और कुछ निकट भविष्य में आएगा जिनकी पोल खुल चुकी है वो अपने आपको बचाने में लगे है जिनकी खुलनी बाकि है वो अपने आपको छुपाने में लगे है, और ए बात जान कर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि घोटालो का पर्दाफाश भी सोनिया मैडम कि मेहरबानी से ही हो रहा है क्युकी राहुल गाँधी के प्रधानमंत्री बनने के रास्ते के काँटों को भी तो साफ करना है, उधर सोनिया मैडम ने "अन्ना हजारे" को राहुल गाँधी के प्रमोसन पर लगा रक्खा है, अन्ना हजारे का पाकिस्तानी सपना और कश्मीर मुद्दे पर प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में दिया प्रसान्त भूसन का बयान भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है "महात्मा गाँधी" ने भारत का खून (दो टुकड़े) करके गद्दी जवाहर लाल नेहरु को दे दी थी अब "गाँधीवादी" अन्नाहजारे भारत का सर काटकर गद्दी राहुल गाँधी को देना चाहते है, सोनिया मैडम अगर भारतियो को इंडियन (मुर्ख) बनाती है तो बात समझ में आती है सैकड़ो साल तक अंग्रेजो ने यही तो किया था, लेकिन अन्ना हजारे और प्रसान्त भूसन जैसे लोग देश को मुर्गा बना लेते है और देश भी कुकड़ू कु करके बाँग देने लगता है, अंतिम बात "पाषाण युग से लेकर परमाणु युग तक दुश्मनों से जीतकर भी इन्सान हमेसा दोस्तों के पक्छाघात से ही हारा है"
ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम

सोमवार, 26 सितंबर 2011

छतिग्रस्त "लोकतंत्र" दुनिया के किसी भी "तानाशाही" ब्यवस्था से ज्यादा भयानक, खतरनाक, और बिध्व्न्सक होता है, भाग ३


"अनिवार्य मतदान" का कानून ही क्यों ? भ्रष्टाचार पर बोलने, सोचने और समझने के लिए कुछ बचा ही नहीं है इस देश की सरकार पूरी कि पूरी भ्रष्टाचार में डूबी हुई है प्रधान मंत्री से लेकर सन्तरी तक, और सरकार से बाहर रहने वाले भी दूध के धुले नहीं है क्युकि पूंजीवादी अर्थब्यवस्था के इस विकृत लोकतंत्र का स्वरूप ही एसा होता है, भ्रष्ट सरकार और पूंजीवादी अर्थब्यवस्था से देस अगर किसी जनहित कानून बनाने कि उम्मीद करता है तो सदी का सबसे रुचिकर चुटकुले से बढ़ कर कुछ नहीं हो सकता, कहने का मतलब पूरी ब्यवस्था को बदलने कि जरुरत है और एसा तभी हो सकता है जब पूरी संसद बदली जाय और संसद बदलने के लिए हमें अपने आप को बदलना होगा और हम यानि इस देस का आम आदमी तो बदलना जानता ही नहीं वर्ना "खून से इतिहास लिखने वाली कांग्रेस सत्ता में नहीं होती" फिर बदलाव के लिए "अनिवार्य मतदान" के कानून के आलावा कोई रास्ता नहीं बचता, "अनिवार्य मतदान" न सिर्फ संसद को साफ करेगा बल्कि मतदान में हो रहे सारे अपराध, अपराध के बल पर मतदान, मतदान के लिए समाज को बाटने अपराध, अपराध और मतदान का घालमेल स्वयम ख़त्म हो जायेगा, आज औसतन ५० प्रतिसत मतदान होता है, १५ प्रतिसत मतदान हासिल करने वाली पार्टी सरकार चलाती है उसमे भी मात्र १ प्रतिसत मतदान मत का अर्थ समझने वालो का होता है बाकि १४ प्रतिसत मतदाता तो मतदान का गूढ़ार्थ तो छोडिये मतदान का शाब्दिक अर्थ भी नहीं जानता और ये मै नहीं इस "विकृत लोकतंत्र" के चौपाये ही समय समय पर आकडे पेस करते रहते है, और मात्र यही वो १ प्रतिसत आदमी इस देश की दसा और दिसा तय करते है, ख़ैर जो ५० प्रतिसत मतदाता मतदान से दूर रहते है वो मध्यवर्गीय, सिक्छित, ही नहीं मतदान का गूढ़ार्थ तो छोडिये मतदान का शाब्दिक अर्थ भी जानते है लेकिन मतदान से दूर रहते है, कारण बहुत से है, कारण को छोडिये, उन्हें तो जगाने की भी जरुरत नहीं है वो जागे हुए है लेकिन दुर्भाग्य से "गाँधी" के तिन बन्दर है, और उनको "अनिवार्य मतदान" का कानून ही मतदान केंद्र तक ला सकता है, एक बार ये ५० प्रतिसत लोग मतदान के लिए आगे आ गए तो मुह, कान और आंख से हाँथ तो वो खुद ही हटा लेगे......जारी..ॐ बन्दे मातरम जयहिंद                                    
ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम

रविवार, 25 सितंबर 2011

"लोकतंत्र" दुनिया के किसी भी "तानाशाही" ब्यवस्था से ज्यादा भयानक, खतरनाक, और बिध्व्न्सक होता है, भाग २

"१०० प्रतिसत मतदान" ही एक मात्र रास्ता बचा है, देश को बचाने, ब्यवस्था परिवर्तन करने, पूंजीवादी अर्थब्यवस्था के इस विकृत लोकतंत्र को ख़त्म कर सच्चे लोकतंत्र की स्थापना करने, पूर्ण स्वराज्य, समग्र विकास ऐवं आध्यात्मिक समाजवाद को कायम करने और देश की दुर्दशा, के लिए जिम्मेदार लोगो को सजा देने के लिए, लेकिन जन जागरण और अनुनय बिनय से देश "१०० प्रतिसत मतदान" का महत्त्व समझने से रहा, क्युकी सदीओ से ९० प्रतिसत से अधिक आवादी तो "गाँधी के तिन बंदरो" की रही है वर्ना क्या मजाल थी की मुट्ठी भर मुग़ल, या फिर गिनती के गोरे सदीओ सासन कर लेते, ख़ैर "१०० प्रतिसत मतदान" सुनिश्चित करने के लिए "अनिवार्य मतदान" का कानून होना जरुरी है, देश के आम आदमी और देशभक्त नायको को पूरा जोर लगाके "अनिवार्य मतदान" का कानून बनवाने का प्रयास करना चाहिए क्युकी यदि "अनिवार्य मतदान" का कानून बन गया तो एक भी पूंजीपती, दलाल, काला धन कुबेर, देशद्रोही, भ्रष्टाचारी और देश का गद्दार संसद तक नहीं पहुँच पायेगा फिर तो बाबारामदेव जी जैसे देश भक्त देश हित में जो भी कानून बनवाना चाहेगे बनवा सकते है, उन्हें चार जून की रात नहीं देखनी पड़ेगी, अन्ना हजारे जी के लोकपाल बिल की आवश्यकता ही नहीं होगी जब संसद में इमानदार, सच्चे, कर्तब्य परायण, निष्ठावान, सद्चरित्र लोग होगे तो वो सारे सपने पुरे होगे जो देश का हर आम आदमी देखेगा, मसखरो, अपराधियो, भांडों, दलालों, देशद्रोहियो और पूंजीपतियो को संसद में पहुँचने से रोकना होगा, एसा तभी होगा जब "अनिवार्य मतदान" का कानून होगा, देश का हर आम और खास इस सच्चाई से वाकिफ है की आज मतदान कौन, ? क्यूँ, ? और कैसे ? करता है, लेकिन ये भी उतना ही सच है की यदि "मतदान अनिवार्य" कर दिया जाय तो अपने आप ही तथा कथित एवं छतिग्रस्त "लोकतंत्र" ख़त्म हो जायेगा और उसके बदले स्वस्थ, सुदृढ़, सुब्य्वस्थित, और सच्चे लोकतंत्र की स्थापना होगी.....जारी...ॐ बंदेमातरम जयहिंद                                          
ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम

शनिवार, 24 सितंबर 2011

छतिग्रस्त "लोकतंत्र" दुनिया के किसी भी "तानाशाही" ब्यवस्था से ज्यादा भयानक, खतरनाक, और बिध्व्न्सक होता है, "भाग १"

हम जिस ब्यवस्था में रहते है उसे लोकतंत्र तो कत्तई नहीं कहा जा सकता, हाँ मुगलों के बर्बर सासन से लेकर अंग्रेजो की दमनकारी ब्यवस्था सहित, पुजीपतियो के शोसनकारी नीतिओ तक का मिलाजुला क्रूर एवं संवेदनहीन पूंजीवादी ब्यवस्था को लोकतंत्र मान कर हम चलरहे है, इस विकृत लोकतंत्र का परिणाम आपके सामने है "भारत के सतप्रतिसत लोग इमानदार है कोई भी बेईमान नहीं है" लेकिन इस ब्यवस्था का लाभ जिनको मिल रहा है, वो इसे बदलना नहीं चाहते, उनकी संख्या भले हि दशमलव सुन्य पांच प्रतिसत है लेकिन १२१ करोड़ पर भारी पड़ रहे है क्युकि ब्यवस्था उनके हाँथ में है, हमें, यानि आम आदमी को इस ब्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेकना होगा, भारतीय उप महाद्वीप में सिर्फ एक मात्र  एक आदमी "बाबारामदेव जी" हि सही दिशा में ब्यवस्था परिवर्तन के लिए कार्य कर रहे है, दिग्भ्रमित करने के लिए "अन्नाहजारे" जैसे लोग भी सामने लाये जायेगे जो टुकडो में बदलाव की बात करेगे, चुकी इस "ब्यवस्था" को टुकडो में बदला ही नहीं जा सकता इस लिए एसे लोगो से या तो दूर रहना है या फिर उनको अपनी बात समझानी पड़ेगी, वैसे तो पूंजीवादी अर्थब्यवस्था अर्थात विकृत लोकतंत्र अमानवीयता के चरम पर पहुँच चूका है इस ब्यवस्था की पराकाष्ठ ही इसके विनास का द्योतक है, "भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ यस आई टी गठित करने के कोर्ट के आदेश को कोर्ट में चुनौती देना" इस ब्यवस्था के नंगेपन का एक छोटा सा उदाहरन भर है, विकृत लोकतंत्र का सबसे अधिक लाभ उठाने वाली कांग्रेस के नंगेपन का तमासा तो सारा देश देख रहा है, बाकी भी कमोबेस येसे हि है, अब ये पूरी तरह साबित हो चूका है की इस विकृत लोकतंत्र को मिटा कर सच्चे लोकतंत्र की स्थापना भी इसी लोकतंत्र मे है, और वो है "१०० प्रतिसत मतदान" यह एक मात्र येसा ब्रह्मास्त्र है जो पूंजीवादी अर्थब्यवस्था के इस विकृत लोकतंत्र को ख़त्म कर सच्चे लोकतंत्र की स्थापना कर सकता है....जारी....ॐ बंदेमातरम जयहिंद                    
ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

छतिग्रस्त "लोकतंत्र" दुनिया के किसी भी "तानाशाही" ब्यवस्था से ज्यादा भयानक, खतरनाक, और बिध्व्न्सक होता है

तथा कथित एवं छतिग्रस्त "लोकतंत्र" दुनिया के किसी भी "तानाशाही" ब्यवस्था से ज्यादा भयानक, खतरनाक, और बिध्व्न्सक होता है, हमारा भारतीय लोकतंत्र इसका सबसे बड़ा उदाहरन है, कहने के लिए तो हम स्वतंत्र है लेकिन मात्र पांच लाख से भी कम लोग (पूंजीपती, दलाल, और बिधाइका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, और सुचना तंत्र से जुड़े कुछ भ्रस्ट देशद्रोहियो, भ्रष्टाचारियो, कालेधनकुबेरो) १२१ करोड़ देश के आम नागरिकों (इमानदार, सच्चे, कर्तब्य परायण, निष्ठावान) पर बर्बर, तानाशाही, षड्यंत्र कारी, दमनकारी, और शोसनकारी ब्यवस्था थोप कर सासन कर रहे है, चाह कर भी देस की आम जनता बस सिसक कर जीने के लिए मजबूर है, यदि "बाबा रामदेव जी" जैसे लोग ब्यवस्था परिवर्तन के लिए झंडा उठाते है तो जान बचाना मुस्किल होता है किसी तरह बच जाते है तो कुचलने का षड्यंत्र रचा जाता है, अग्निवेस जैसे दलालों को पीछे लगाया जाता है, अन्नाहजारे जैसे लोगो से खोखले गाँधीवादी अहिंसावाद का नारा लगवाकर आम लोगो को बरगलाने की कोशिश की जाती है, दुनिया को अँधेरे में रखने के लिए "३२ रूपये का स्लम डाग मिलेनियर" और "२६ रूपये का विलेज डाग मिलेनियर" बनाया जाता है, आम आदमी भूख, गरीबी, बदहाली में जीने को मजबूर  है, लोग आत्महत्या तक कर लेते है, और अगर कही गलती से आँख दिखाने की कोसिस कर दिए तो नक्सलवादी, माओवादी (माओवाद ने चीन को दो साल बाद आजाद होने के बाद भी हमसे दो सौ साल आगे पहुंचा दिया है) और पता नहीं कौन, कौन, से वादी बता कर मार देगे मतलब ये की देश का आम आदमी मरने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, एक आम आदमी बिन मागी मुराद की तरह पैदा होते ही कुपोषण का सिकार होकर मरने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, अगर जीता रहा तो दोहरी सिक्छा निति के कारण असिक्छित रहने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, अगर मेहनत मजदूरी करके कुछ कमा भी ले तो सरकार द्वारा हर नुक्कड़ पर बिक रही सराब पीकर मरने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, वैसे तो मरने के लिए और भी ब्यस्था है जैसे सिगरेट, बीडी, तम्बाखू, गुटखा, इत्यादि फिर भी कुछ पैसे लेकर अगर घर पहुच भी गया तो परिवार का पेट तो भर नहीं सकता भूखे रहकर प्यार के सहारे मरने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, मरे यां न मरे लेकिन एक और आम आदमी बिन मागी मुराद की तरह पैदा कर देगा मरने के लिए, यहाँ कि बेटियां भी चंद पेसो में अस्मत तक बेच देती है  परिवार का पेट भरने के लिए और ये सब कुछ उस देश में होता है जहाँ घोटाले भी अब "लाखो करोड़" से कम के नहीं होते, इन सब के लिए जिम्मेदार है तथा कथित एवं छतिग्रस्त "लोकतंत्र"
ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम

सोमवार, 19 सितंबर 2011

"मीडिया से तिन सवाल जिन्दा है जमीर तो दे जबाब"


देशद्रोहियो, भ्रष्टाचारियो, कालेधनकुबेरो, पूंजीपतियो, द्वारा चलाये जा रहा "मीडिया" जिसे दुर्भाग्य से तथाकथित लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ भी कहा जाता है, अपने मालिको की डुगडुगी के अलावा भाड़ो का प्रचारक, देश की संस्कृति का बिध्वन्स्क, और देस के आम आदमी को बरगलाने का काम कर रहा है, देश में कुछ करने वालो की तो वैसे ही कमी है और जो करते है उनकी टांग खीचना ही अपना धंधा बना लिया है, इस देश का आम आदमी देश के तथाकथित लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ "मीडिया" से शिर्फ तिन सवाल पूंछता है, यदि कही उसका जमीर थोडा बहुत जिन्दा है तो जबाब दे, "पहला" युगपुरुष बाबारामदेव जो देशद्रोहियो, भ्रष्टाचारियो, कालेधनकुबेरो, पूंजीपतियो, से युद्ध छेड़ रक्खा है देस के आम आदमी के लिए पूरी सच्चाई और ईमानदारी से स्वदेशी, स्वराज्य, सुब्यव्स्था सुशासन देने के लिए योग और अध्यात्म से कर्तब्य परायणता के साथ प्रण और प्राण को लेकर अग्रसर है, यदि हम अध्यात्म में न जाकर ३०० साल के इतिहास को देखे तो "उपदेशक" बहुत मिल जायेगे लेकिन एसा कर्मयौद्धा कोई नहीं मिलता जो सीधे आम आदमी से जुड़ कर समग्र विकास कि क्रांति लाया हो यदि हाँ तो बताये ? वरना साथ दे या न दे बाबारामदेव के बिरुद्ध दुष्प्रचार करना बंद करे.. "दूसरा" विकिलीक्स द्वारा छोड़े गए सगुफो (बिस्वस्नियता संदेहास्पद है) को खूब उछालता है यहाँ तक की मायावती के सैंडल तक निकाल कर उछाल देता है, लेकिन बिदेसी बैंको में जमा काले धन के नामो की एक लिस्ट भी मीडिया के पास है उनका नाम मीडिया के जुबान पर क्यों नहीं आ रहा है क्या वो नाम उन्ही के मालिको का है ? कम से कम एक सवाल तो मीडिया पूंछ ही सकता है और अगर नहीं तो क्यों ?????? "तीसरा" नरेन्द्र मोदी जिस दिन से गुजरात के मुख्यमंत्री बने है उसी दिन से मीडिया दुष्प्रचार में लगी हुई है, तिसपर गुजरात के दंगो के बाद तो बस उसे जैसे समय ही रुक गया हो "मिडिया बनाम मोदी" का तृतीय बिस्व युद्ध अभी तक ख़त्म नहीं हुआ जबकि नरेंद्र मोदी भारत के पहले मुख्यमंत्री है जिन्होंने अपने काम का लोहा अपने दुश्मनों से भी मनवा लिया और "माई बाप कांग्रेश भी कहने को मजबूर हो गई की "बिकास की बात छोडिये लासो के सौदागर की बात कीजिये" ख़ैर ये निर्विवाद साबित हो चूका है की नरेंद्र मोदी देस के सबसे काबिल मुख्यमंत्री है लेकिन मीडिया चाहती है की "नरेंद्र मोदी माफी मांगे" लगभग हर मीडिया वाले ने ये सवाल मोदी से किया, हजारो बार यही सवाल, देश का आम आदमी मीडिया से जानना चाहता है कि किस बात के लिए नरेंद्र मोदी माफी मागे ? गोधरा में नर पिचासो ने पूरी योजना बनाकर निहत्थे यात्रिओ को ट्रेन की एक बोगी में बंद करके जला दिया इस अमानवीय "क्रिया" को मोदी प्रसासन रोकने में नाकाम रहा तो अब उसका कोई ओचित्य नहीं है क्युकी गुजरात का विकास करके मोदी ने गोधरा के उन सहिदो से, और गुजरात की जनता से माफी माग ली और जनता ने उन्हें माफ करके दोबारा मुख्यमंत्री बनाया, रही बात बाद में हुई "प्रतिक्रिया" की तो दुनिया के किसी धर्म, या इतिहास में कभी किसी के माफी मागने का उदाहरन नहीं मिलता क्युकी "क्रिया" की "प्रतिक्रिया" तो प्राकृतिक नियम है जिसके लिए कोई जिम्मेदार नहीं होता बल्कि "प्रतिक्रिया" ही "क्रियाओं" कि पुनाराब्रित्ति के न होने को सुनिश्चित करता है ??????? ॐ बंदेमातरम जयहिंद                                                                                                              


ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम

बुधवार, 14 सितंबर 2011

"गाँधीवादी" श्री अन्नाहजारे जी सच

"गाँधीवादी" श्री अन्नाहजारे जी को कल एक टी. वी. चैनल से कहते देखा "मनमोहन सिंह बड़े अच्छे है" "सोनिया गाँधी बड़ी अच्छी है" "कांग्रेस में सभी बड़े अच्छे है" कुछ लोगो से उन्हें सिकायत है जैसे दिग्बिजय सिंह "वो भी बड़े अच्छे थे साथ में वर्षो काम भी किये अब न जाने क्या हो गया है" हाँ ये अलग बात है की "चेहरे की मुस्कराहट और आँखों का संतोष बिना शब्दों के दिग्बिजय, कपिल, तिवारी, जैसे लोगो को अपनी टी. आर. पि. बढ़ाने के लिये सहृदय धन्यवाद और "कांग्रेस कि विजय" के लिए आशीर्वाद दे रहा था" ख़ैर आगे अपने ब्याख्यान में बुरे लोगो के बारे में भी प्रकाश डालते हुए कहा "अडवाणी को रथयात्रा कि क्या जरुरत है लोकपाल बिल बनवा देते" चुटकी लेते हुए इस बात को तो बस जुमले कि तरह इस्तेमाल किया सिर्फ अगले बुरे आदमी "बाबा रामदेव" पर प्रहार करने के लिए "मैने तो बाबारामदेव से उसी दिन फोन करके रिश्ता तोड़ लिया था जिसदिन अपनी सेना बनाने कि बात बोली थी" ख़ैर "गाँधीवादी" श्री अन्नाहजारे जी आपने बहुत अच्छा किया रालेगावं से जिस बिचारधारा (आदमी) कि ऊँगली पकड़ कर दिल्ली तक आये थे उसे दिल्ली से उठवा कर हरिद्वार फेकवा दिया बहुत अच्छा किया, अगर आप एसा न करते तो इतिहास अधुरा रह जाता, कहते है दोस्त का दुसमन कभी दोस्त नहीं होता और बाबा रामदेव ने तो आपके कुनबे से ही दुश्मनी कर ली, कोई बात नहीं "गाँधीवादी" श्री अन्नाहजारे जी अब तो ये देश ही तय करेगा कि उसे २०१४ में वर्णशंकर के "युवराज" की ताजपोशी एक "गाँधीवादी" के हाथो देखना मंजूर है या एक कर्मबीर, समग्र बिकास, सम्पूर्ण स्वतंत्रता, के पथ पर अग्रसर बाबा रामदेव जी जैसे के साथ अपने उचित हक़ के लिए लड़ना
ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

आज़ादी की दूसरी लड़ाई(?)


आज़ादी की दूसरी लड़ाई(?)....शीषर्क से लिखा नगेश कुमार नेहरा का लेख तात्कालिक परिस्थितियो, पात्रो, और घटनाओ को आधार मान कर प्रथम दृष्टया काफी अच्छा है लेकिन दृष्टिकोण गलत है, "कांग्रेस" और "गांधीजी" को अलग कर के देखना ही दिन के दोपहर में आंख बंद करके चाँदनी रात की अनुभूति करने जैसा है, "कांग्रेस" के बिना "गांधीजी" और "गांधीजी" के बिना "कांग्रेस" की परिकल्पना करना ही असम्भव है, "कांग्रेस" की यु. पि. ये. सरकार और "गाँधीवादी" श्री अन्नाहजारेजी दोनों एक दुसरे के पूरक एवं एक ही सिक्के के दो पहलु है, कहते है इतिहास हमेसा खुद को दोहराता है, एक बार फिर १९१७ से १९४७ के तिन दसक का इतिहास लिखा जाने वाला है, यदि समय रहते आम आदमी को बात समझ में नहीं आई तो २०१४ में वर्णशंकर के "युवराज" की ताजपोशी एक "गाँधीवादी" के हाथो देखना देश की मज़बूरी बन जाएगी, क्युकि पूंजीपतियो, कालेधनकुबेरों, और देशद्रोहियो ने "चक्रब्यूह" कि संरचना कर दी है, आम आदमी कि आशाएं और देश हित रूपी "अभिमन्यु" को कर्ण, क्रिपाचार्य, और द्रोणाचार्य रूपी "कार्यपालिका" के घेरे में लेकर भीष्म रूपी "बिधयाका" के सहयोग और समर्थन से "अश्वस्थामा" रूपी "पूंजीपतियो, कालेधनकुबेरों, और देशद्रोहियो" द्वारा एक बार फिर मार दिया जायेगा और संजय रूपी "पूंजीपतियो, कालेधनकुबेरों, और देशद्रोहियो" कि डुगडुगी "मीडिया" ध्रितराष्ट्र रूपी "न्यायपालिका" को संसोधित परिद्रिस्य दिखा कर गुमराह करता रहेगा, ख़ैर जो भी हो आम आदमियो को अपने हितो कि रक्छा खुद साहस, धैर्य, एकता, और विवेक से किसी आक्रामक, क्रांतिदूत, सम्पूर्ण ब्यवस्था परिवर्तन, पूर्ण स्वराज्य, के लिए कटिबद्ध को आगे करके लड़ना होगा, चलते चलते एक सवाल आपसे, क्या १९४७ में हम आजाद हुए थे ? यदि हाँ तो कोई बात नहीं, बस मुझे माफ करना, और यदि नहीं तो एक बार फिर १९१५ से १९४७ का इतिहास पढना तथा उस दौरान हुई गलतियो को मत दोहराना | ॐ बंदेमातरम जयहिंद


ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम

सोमवार, 12 सितंबर 2011

श्री बाबा रामदेव जी को "कहिये जनाब"


श्री बाबा रामदेव जी को "कहिये जनाब" कार्यक्रम में बोलते देख बहुत संतोष हुआ, बाबा काफी आक्रामक लगे कुछ समय पहले तक लम्बे सवाल होते थे और बहुत छोटा सा बाबा का जबाब जो कुछ लोगो को तो समझ में आती थी, बहुत लोगो को नहीं, लेकिन अब आपकी बात "गुरुकुल" वाले भी समझेगे "और कान्वेंट वाले भी" ख़ैर "गीता" में लिखा है "आक्रमण ही सुरक्छा का प्रथम उपाय है" इसको तो कान्वेंट, कैम्ब्रिज, और हावर्ड वाले भी समझ जायेगे
ॐ बन्दे मातरम जय हिंद              

ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम

शनिवार, 10 सितंबर 2011

"सात सितम्बर के सहीदो को कोटि कोटि नमन, और नपुंसक सरकार और उनके कर्णधारो को साधुवाद"

"सात सितम्बर के सहीदो को कोटि कोटि नमन, और नपुंसक सरकार और उनके कर्णधारो को साधुवाद" दिल्ली हाईकोर्ट के सामने मारे गए सहीद देस के यैसे सिपाही थे जिन्हें बिना हथियार और बिना सुरक्षा के "हथियार बंद आतंकियो" से लड़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, आतंकियो और उनके हिमायतियो को खुला छोड़ दिया गया है और जो पकडे गए है उनकी खातिरदारी की जा रही है, १९४७ से पहले की तरह सजा कम, सजा का नाटक किया जा रहा है जो अंग्रेज अपने "अंग्रेज" गुनहगारो को बचाने के लिए किया करते थे, "देश के कायर कर्णधारो ने तो कमांडो के बीच खड़े हो कर अफसोस जताने की खानापूर्ती की, लासो और आंसुओ की कीमत भी तय कर दी और देस को और भी आंसू बहाने पड़गे रोका नहीं जा सकता बोल कर अपना कर्तब्य भी निभा दिया" जो भी हो इससे ज्यादा की उम्मीद देश को इनसे करनी भी नहीं चाहिए, लेकिन देश के बीर जन नायको, कर्णधारो से मेरा अनुरोध है की आप अपनी या अपने परिवार की सुरक्छा हटा दीजिये, आधे से ज्यादा सुरक्छा ब्यवस्था को आपने कुछ हजार अपने लोगो के लिए फसा रखा है, आप बीच से हट जाइये देश की सेना और देश की पुलिश पूरी तरह से समर्थ है देश की रक्छा के लिए, और देश के हर गावं, गली, मोहल्ले में माँ भारती के लालो को हथियार देकर पुलिश के संरक्छन में "बंदेमातरम" सुरक्छा टोली तैयार कीजिये, किसी भी भारतीय का एक बूंद खून धरती पर गिर जाय तो ..............?
ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

"अहिंसावाद" कायरो की ढाल और पूंजीपतियो की तलवार


"मै अहिंसावादी नहीं हूँ" हाँ ये अलग बात है कि कभी जानबूझ कर एक चीटी भी नहीं मारा, फिर इस तरह से देखा जाय तो मै हिंसावादी भी नहीं हूँ, बात १९१४ कि है मेरी उम्र १५ साल कि है मेरा घर एक धार्मिक किन्तु छोटे सहर के अंग्रेजों कि छावनी के करीब है पिता किशान और मै आवारा (पिता कि निगाह में) बंदेमातरम, इन्कलाब जिन्दावाद, अंग्रेजो भारत छोडो के नारे लगाने वाला, रोज कही न कही भीड़ में सामिल हो कर यही करते, तबतक, जबतक गोरे अंग्रेज अफसर कि अगुआई में काले अंग्रेज हमें भगाते नहीं, एक दिन काले अंग्रेज ने "गोरे" से हमारी पहचान बता दी फिर क्या था एक गोरा अंग्रेज अफसर चार गोरे सिपाही और २० काले अंग्रेज सिपाही मेरे कर्मो की सजा मेरे परिवार को देने के लिए घर पे धावा बोल दिए घर में माँ के आलावा दो बहने भी थी एक मुझसे बड़ी १६ साल की सादी हो गई थी बिदाई नहीं हुई थी, दूसरी १३ साल की मुझसे छोटी, मुझे और मेरे पिता को मेरे आंगन में ही बांध दिया और हमें खूब मारा इतना मारा की पिता जी कब मर गए पता ही नहीं चला बस आवाज आनी बंद हो गई, गाँव के नौजवान आगे आने की कोसिस की तो काले अंग्रेजो ने डरा कर भगा दिया फिर भी कुछ नौजवान आगे आना चाहते थे लेकिन "गांधीवादियो" ने अहिंसा परमोधर्म का पाठ पढ़ा कर कायर बना दिया जुल्म की इन्तहां तो तब हुई जब हमारे सामने ही मेरी माँ और बहनों पर अंग्रेज भूखे भेड़िये की तरह टूट पड़े उस एक छण में ही "गांधीवाद" का अर्थ और परिणाम दोनों सामने था अब तो मेरे पास न मेरा गाल बचा था दूसरा थप्पड़ खाने के लिए और ना हि दूसरी माँ और बहन उन्हें लाकर देने के लिए मै "गाँधी" के आदेश का कैसे पालन करता "मरता क्या न करता" फिर क्या था माँ भारती का नारा लगाया "बंदेमातरम" और रन चंडी बिन्ध्य्वासनी का घोष इतनी जोर से किया कि रस्सियो का बंधन कब टूटे पता नहीं कोई कुछ समझ पाता उससे पहले ही मै रसोई में भागा मिटटी के तेल से भरा डब्बा और माचिस उठा कर बाहर भागा काले और गोरे सिपाही सोच रहे थे की मै जान बचाने के लिए इधर उधर भाग रहा हूँ लेकिन मेरे दिमाग ने तो रणचंडी का नाम लेते ही एक छण में सोच लिया था की आगे क्या करना है बाहर निकलते ही दरवाजे पर लगी छप्पर में आग लगा दी घर के चारो तरफ छप्पर लगी थी पसुओ को बाधने के लिए, बस मै तेल डालता गया आग ने पुरे घर को घेर लिया कोई नहीं बचा सारे के सारे २५ सिपाही काले और गोरे दोनों जल कर राख हो गए, लेकिन उस आग ने मेरे पिता, मेरी माँ, और बहनों को भी जला डाला मेरे मन कि आस्था "अहिंसावाद" और "गांधीवाद" को भी जला कर राख कर दिया अब मै अकेला नहीं था मेरे साथ सात और नौजवान हो लिए थे आपस मै परिचय बस "बंदेमातरम" था अंग्रेजो का हमला हमारे घर पांच बजे सुबह सुरु हुआ था और उपरोक्क्त सारी घटनाये आधे घंटे मे घट चुकी थी हम पागल हो चुके थे हमारे हाथो मे मिटटी के तेल के डब्बे और जलती हुई मशाले थी "बंदेमातरम" का नारा लगाते हुए छ बजते बजते हमने अंग्रेजो कि छावनी पर धावा बोल दिए अब तक हमारी संख्या पचासों के उपर पहुँच चुकी थी ज्यादातर हमारे गावं के नौजवान ही थे लगभग एक किलोमीटर के दायरे मे बसी पूरी छावनी को हमने आग के हवाले कर दिया, हमारे कुछ साथी भी अपनी जान गवा चुके थे, साम होते होते हमारे सभी साथी अलग अलग भूमिगत हो गए, पूरा गावं ख़ाली हो चूका था अंग्रेजो ने बाहर से सेनाये बुलाकर साम होने से पहले मेरे गावं पर धावा बोलकर जला डाला लेकिन तबतक इन्सान तो क्या कुत्ते भी गावं छोड़ चुके थे बस और बस मै अकेला अपनी माँ और बहन कि लाश के पास बैठ कर रो रहा था अंग्रेज फिर मेरे घर के करीब भी नहीं आये कब तक रोता ? सोचा पिता, माता और बहनों कि अस्थिया ले कर गंगा मे बहा दू पर चाह कर भी येसा कर न सका, सरीर ने साथ नहीं दिया फिर मुझे अहसास हुआ कि मेरा तो सरीर ही मेरे साथ नहीं है मै बस एक सोच हु बस एक आत्मा अपने सवालों के साथ आज भी भटक रहा हु, मेरी आत्मा ने मेरे सरीर को कब?, क्यों?, कैसे? और कहाँ छोड़ा?, मैने तो आजादी मागने कि गलती कि थी पर मेरे पिता, माँ,  और बहनों ने कौन सी गलती कि थी? मै तो "अहिंसावादी" "गाँधीवादी" था फिर ये सब मेरे साथ क्यों हुआ? गांधीजी ने तो हिंसावादी कह कर हमसे नाता ही तोड़ लिया पास ही नहीं आने देते आखिर क्यों? मैने जो भी किया अगर वो न करता तो क्या करता? अंत मे, हमारे साथ लाखो आत्माए हमारी तरह ही इन्ही सवालों के साथ भटक रही है क्युकी भारत के लाखो गावो मे लगभग येसी ही घटनाये दुहराई गई है, और अब आखिरी सवाल आपसे (जिन्दा इंसानों से) "अहिंसावाद" का शाब्दिक अर्थ और पर्यायवाची शब्द शिर्फ़ और शिर्फ़ "कायरता" होता है यदि नहीं तो बताये?                  


ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम

शनिवार, 3 सितंबर 2011

"मुद्दा" बनाम "तथाकथित लोकतंत्र"

तथाकथित भारतीय लोकतंत्र (पूजीवादी अर्थ ब्यवस्था) अब सक्रमण काल से गुजर रहा है, अपने अंतिम चरण में होने के कारण, ख़त्म होते आस्तित्व को बचाने के लिए पूरी ताक़त झोंक चूका है ईस लिए आम आदमी तथा उनके नायको (स्वामी रामदेवजी जैसे लोगों) को भयभीत और त्रसित किया जायेगा, तथाकथित भारतीय लोकतंत्र (पूजीवादी अर्थ ब्यवस्था)लोकतंत्र के चारो खम्भों (बिधाइका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, और सुचना तंत्र) को दीमक की तरह चाट कर खोखला कर दिया है, तथाकथित भारतीय लोकतंत्र (पूजीवादी अर्थ ब्यवस्था) आज कुछ हजार लोगों (पूंजीपतियो) द्वारा काले धन के बल पर बंधक बना लिया गया है अब युद्ध सीधे "आम आदमी" जो झंडा उठा कर सड़क पर उतर चूका है और "पूंजीपतियो" जो अपने बंधकों (बिधाइका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, और सुचना तंत्र) को आगे करके लड़ रहा है, के बीच छिड चूका है, ये लड़ाई अब नहीं रुकेगी जीत आम आदमी की हि होगी, ईस धर्मयुद्ध में भले हि लड़ाई "आम आदमी" और "पुजिपतिओं" के बीच हो, लेकिन कुल सात पक्छ होंगे १-आम आदमी, २-आम आदमियो के संचालक, मार्गदर्शक व् नायक ३-बिधाइका, ४-कार्यपालिका, ५-न्यायपालिका, ६-और सुचना तंत्र, ७-पूंजीपती

उपरोक्त सातो पक्छ से मेरा अनुरोध है कि युद्ध को रोका तो नहीं जा सकता लेकिन धर्मयुद्ध मानकर लड़ा जाय तो समय और हानि दोनों को कम किया जा सकता है


१-पहला अनुरोध आम आदमी से है बेचारा, गरीब, लाचार, मजबूर, असहाय, किसान जैसी उपाधिया हमें देने वाले भी पूंजीपती है और बनाने वाले भी, हमारी लड़ाई सदीओ से फले फूले घाघ देश द्रोहियो से है जो समाज के बहुतेरे सिखंडियो कि आड़ में छुपकर हमारा खून चूसते रहे है अब सीधी लड़ाई पर उतर आये है, काले धन के बल पर कुछ तो संसद, राज्यसभा, बिधानसभा, बिधानपरिसद, होते हुए सत्ता पर काबिज हो गए और कुछ परदे के पीछे से नियंत्रण कर रहे है एसे हालात में आम आदमी को अपने "मुद्दों" (काले धन को राष्ट्रिय संपत्ति घोषित करना, देश से लूटे हुए पैसे को बिदेशो में जमा करने को देशद्रोह करार देना, ब्यवस्था परिवर्तन जैसे शिछा, चिकत्सा, कानून, अर्थ और कृषि के मामले में शम्पूर्ण क्रांति, टुकडो में कुछ भी नहीं चाहिए) को समझकर, अपने "नायको" (क्रांति दूत श्री बाबा रामदेवजी के अलावा कोई हो ही नहीं सकता) को पहचानकर और एक जुट होकर देश के मजबूत तिरंगे झंडे के साथ सडक पर उतरना होगा


२-दूसरा अनुरोध आम आदमियो के संचालको, मार्गदर्शको, नायको, देश की सभी स्वयम सेवी संस्थाओ के संचालको और देश हित में काम करने वाले स्वयम सेवको से है की यदि आप देश भक्त है, देश हित को सर्वोपरि मान कर चलते है, आम आदमी और देश का मुद्दा ही आपका लक्ष्य है, "यदि आप को इस देश का दूसरा गांधीजी नहीं बनना है", यदि आप को भगतसिंह को, शुभाष चन्द्र बोश को, और चन्द्रसेखर आजाद जैसे क्रान्तिकारियो को अपना आदर्श बनाना है तो बिना किसी मतभेद के अविलम्ब भारत स्वाभिमान से जुड़कर श्री बाबारामदेव जी के नेत्रित्व में एकमत होकर समग्र क्रांति का आवाहन करे, देश का हर आम आदमी आपके साथ होगा


३-तीसरा अनुरोध बिधाइका से है, कहने को तो समाज सेवक है आप, देश के नायक है आप, देश के कर्णधार है आप, देश के बिधाता है आप, लेकिन चोर, गद्दार, देशद्रोही, भ्रष्टाचारी, अत्याचारी, जैसे नामो से अब देश की जनता आप को बुलाती है और इसके लिए आप खुद जिम्मेदार है सच तो ये है की आपके बीच मात्र ३०% ही चोर, गद्दार, देशद्रोही, भ्रष्टाचारी, अत्याचारी है जिनमे से १५% को आपने खुद अंदर बुला लिया और १५% लोग सत्ता के नशे में चूर होकर चोर, गद्दार, देशद्रोही, भ्रष्टाचारी, अत्याचारी बन गए, मेरा अनुरोध सिर्फ उन ७०% लोगो से है की आप देश की आम जनता का साथ दे, सत्ता का लोभ त्यागकर बाहर आयें और देश की लाज बचाये, देश को २०२० तक बिश्व का नेता बनायें, अगला एक दसक बिस्व के हजारो साल के इतिहास पर भारी होगा आपको तय करना है इतिहास में अपना अस्थान


४-चौथा अनुरोध कार्यपालिका से है जो हमेसा से चोरो, गद्दारों, देशद्रोहियो, भ्रष्टाचारियो, अत्याचारियो, तानाशाहों के हाँथो एक निर्जीव हथियार की तरह इस्तेमाल होते रहे है, चाहे इतिहास के अत्याचारी तानाशाह रहे हो, क्रान्तिकारियो से लेकर आम आदमी तक का दमन करने वाले अंग्रेज रहे हो या फिर आज सत्ता के नशे में चूर देशद्रोही और भ्रष्टाचारी सबने आपको(कार्यपालिका) हमारे (आम जनता) खिलाफ इस्तेमाल किया है लेकिन हम जानते है की आप निर्जीव नहीं सजीव है हमारे अंग है हम पर लाठी या गोली चलाने के बाद भले ही तानाशाही जस्न मनाये, पर घर जाकर आपने माँ की टूटी हड्डिया देख कर आंसू रोक नहीं पाए होगे, बाप का फुटा सर देख कर दिल चीख उठा होगा, भाई की लाश देख कर पागल हो गए होगे और फिर आत्मा की आवाज नहीं दबा पाए, परिणामस्वरूप पुलिस और सेनाओ में होने वाले बिद्रोह को इतिहाश देखा है, ख़ैर आगे हम आपके विवेक पर छोड़ते है इस धर्मयुद्ध में आप अपनी भूमिका खुद तय करे हा इतना जरुर कहेगे की भारत के संबिधान में भी "आधी रात को सोये हुए माताओ, बहनों, बेटियो, बुजुर्गो, संतो, साधुओ, सन्यासियो पर लाठी और गोली चलाना किन्ही भी परिस्थितियो में जायज है" नहीं लिखा है


५-पांचवा अनुरोध न्यायपालिका से है कि मंदिर के बाद यही वो जगह बची है जहा भ्रष्टाचार रूपी संक्रामक बीमारी के असर से ९०% तक बचा है १०% जिन्हें आप राज्यसभा और लोकसभा में चल रहे महाभियोग के रूप में देखा जा सकता है ख़ैर आम आदमी तो बस न्याय मंदिर में जल रही न्याय कि "लौ" को ही अपना अंतिम सहारा समझता है और आशा ही नहीं बिस्वास भी है कि आप इस "लौ" को बुझने नहीं देगे


६- छठा अनुरोध सुचना तंत्र से है, कि हम जानते है इस धर्मयुद्ध में सबसे ज्यादा धर्म संकट में आप ही होगे एक तरफ आपका दर्शक (आम नागरिक) होगा दूसरी तरफ आपका अन्नदाता (आपका मालिक पूंजीपती), आपकी आत्मा आम आदमी के साथ होगी क्युकि न्याय आम आदमी के साथ होगा लेकिन आपका सरीर नमक के बोझ तले दबा मालिक का साथ देने को मजबूर करेगा और इस अंतर्द्वंद से लड़ते हुए आप क्या करेगे हम आप पे छोड़ते है, हाँ इतना जरुर कहेगे की अब इस देश को एक और गाँधीजी की जरुरत नहीं है "ब्यक्तित्ववाद" के तले आम आदमी का "मुद्दा" दब कर रह जाता है, नया उदहारण ले लीजिये श्री अन्नाहजारे जी के निचे आम आदमी का मुद्दा दबा कर मार डाला आपलोगों ने, अब देश को अन्नाहजारे जी कि दिनचर्या दिखा कर पका रहे है जिसका आम आदमी की समस्याओ से कोई मतलब ही नहीं है ये अलग बात है की येसा करने के लिए आपके मालिको का सक्त निर्देश होगा, फिर भी यदि आप देश हित चाहते है देश भक्त है तो किसी भी ब्यक्ति को मुद्दे से ऊपर उठाने कि कोशिश न करे


७-सातवा सन्देश पूंजीपतियो, देशद्रोहियो, और भ्रष्टाचारियो को (यहाँ अनुरोध शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकता क्युकि कसाई और "गाय" के बिच ये शब्द अपना अर्थ खो चूका होता है) दुनिया का कोई भी तानाशाह हाँथ में देश का झंडा लिए नारे लगाती भीड़ के लहर में खुद को टिका कर रख नहीं पाया है क्युकि बर्दास्त कि हद जिस दिन ख़त्म हो जाती है उस दिन झंडा सर पे और डंडा हाँथ में होता है इतिहास बनते देर नहीं लगती, समय रहते लाचारो, गरीबो, बेचारो, मजदूरो, किसानो, को उनका जायज हक़ छोड़ दे तो ही अच्छा होगा
ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम