तथाकथित भारतीय लोकतंत्र (पूजीवादी अर्थ ब्यवस्था) अब सक्रमण काल से गुजर रहा है, अपने अंतिम चरण में होने के कारण, ख़त्म होते आस्तित्व को बचाने के लिए पूरी ताक़त झोंक चूका है ईस लिए आम आदमी तथा उनके नायको (स्वामी रामदेवजी जैसे लोगों) को भयभीत और त्रसित किया जायेगा, तथाकथित भारतीय लोकतंत्र (पूजीवादी अर्थ ब्यवस्था)लोकतंत्र के चारो खम्भों (बिधाइका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, और सुचना तंत्र) को दीमक की तरह चाट कर खोखला कर दिया है, तथाकथित भारतीय लोकतंत्र (पूजीवादी अर्थ ब्यवस्था) आज कुछ हजार लोगों (पूंजीपतियो) द्वारा काले धन के बल पर बंधक बना लिया गया है अब युद्ध सीधे "आम आदमी" जो झंडा उठा कर सड़क पर उतर चूका है और "पूंजीपतियो" जो अपने बंधकों (बिधाइका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, और सुचना तंत्र) को आगे करके लड़ रहा है, के बीच छिड चूका है, ये लड़ाई अब नहीं रुकेगी जीत आम आदमी की हि होगी, ईस धर्मयुद्ध में भले हि लड़ाई "आम आदमी" और "पुजिपतिओं" के बीच हो, लेकिन कुल सात पक्छ होंगे १-आम आदमी, २-आम आदमियो के संचालक, मार्गदर्शक व् नायक ३-बिधाइका, ४-कार्यपालिका, ५-न्यायपालिका, ६-और सुचना तंत्र, ७-पूंजीपती
उपरोक्त सातो पक्छ से मेरा अनुरोध है कि युद्ध को रोका तो नहीं जा सकता लेकिन धर्मयुद्ध मानकर लड़ा जाय तो समय और हानि दोनों को कम किया जा सकता है
१-पहला अनुरोध आम आदमी से है बेचारा, गरीब, लाचार, मजबूर, असहाय, किसान जैसी उपाधिया हमें देने वाले भी पूंजीपती है और बनाने वाले भी, हमारी लड़ाई सदीओ से फले फूले घाघ देश द्रोहियो से है जो समाज के बहुतेरे सिखंडियो कि आड़ में छुपकर हमारा खून चूसते रहे है अब सीधी लड़ाई पर उतर आये है, काले धन के बल पर कुछ तो संसद, राज्यसभा, बिधानसभा, बिधानपरिसद, होते हुए सत्ता पर काबिज हो गए और कुछ परदे के पीछे से नियंत्रण कर रहे है एसे हालात में आम आदमी को अपने "मुद्दों" (काले धन को राष्ट्रिय संपत्ति घोषित करना, देश से लूटे हुए पैसे को बिदेशो में जमा करने को देशद्रोह करार देना, ब्यवस्था परिवर्तन जैसे शिछा, चिकत्सा, कानून, अर्थ और कृषि के मामले में शम्पूर्ण क्रांति, टुकडो में कुछ भी नहीं चाहिए) को समझकर, अपने "नायको" (क्रांति दूत श्री बाबा रामदेवजी के अलावा कोई हो ही नहीं सकता) को पहचानकर और एक जुट होकर देश के मजबूत तिरंगे झंडे के साथ सडक पर उतरना होगा
२-दूसरा अनुरोध आम आदमियो के संचालको, मार्गदर्शको, नायको, देश की सभी स्वयम सेवी संस्थाओ के संचालको और देश हित में काम करने वाले स्वयम सेवको से है की यदि आप देश भक्त है, देश हित को सर्वोपरि मान कर चलते है, आम आदमी और देश का मुद्दा ही आपका लक्ष्य है, "यदि आप को इस देश का दूसरा गांधीजी नहीं बनना है", यदि आप को भगतसिंह को, शुभाष चन्द्र बोश को, और चन्द्रसेखर आजाद जैसे क्रान्तिकारियो को अपना आदर्श बनाना है तो बिना किसी मतभेद के अविलम्ब भारत स्वाभिमान से जुड़कर श्री बाबारामदेव जी के नेत्रित्व में एकमत होकर समग्र क्रांति का आवाहन करे, देश का हर आम आदमी आपके साथ होगा
३-तीसरा अनुरोध बिधाइका से है, कहने को तो समाज सेवक है आप, देश के नायक है आप, देश के कर्णधार है आप, देश के बिधाता है आप, लेकिन चोर, गद्दार, देशद्रोही, भ्रष्टाचारी, अत्याचारी, जैसे नामो से अब देश की जनता आप को बुलाती है और इसके लिए आप खुद जिम्मेदार है सच तो ये है की आपके बीच मात्र ३०% ही चोर, गद्दार, देशद्रोही, भ्रष्टाचारी, अत्याचारी है जिनमे से १५% को आपने खुद अंदर बुला लिया और १५% लोग सत्ता के नशे में चूर होकर चोर, गद्दार, देशद्रोही, भ्रष्टाचारी, अत्याचारी बन गए, मेरा अनुरोध सिर्फ उन ७०% लोगो से है की आप देश की आम जनता का साथ दे, सत्ता का लोभ त्यागकर बाहर आयें और देश की लाज बचाये, देश को २०२० तक बिश्व का नेता बनायें, अगला एक दसक बिस्व के हजारो साल के इतिहास पर भारी होगा आपको तय करना है इतिहास में अपना अस्थान
४-चौथा अनुरोध कार्यपालिका से है जो हमेसा से चोरो, गद्दारों, देशद्रोहियो, भ्रष्टाचारियो, अत्याचारियो, तानाशाहों के हाँथो एक निर्जीव हथियार की तरह इस्तेमाल होते रहे है, चाहे इतिहास के अत्याचारी तानाशाह रहे हो, क्रान्तिकारियो से लेकर आम आदमी तक का दमन करने वाले अंग्रेज रहे हो या फिर आज सत्ता के नशे में चूर देशद्रोही और भ्रष्टाचारी सबने आपको(कार्यपालिका) हमारे (आम जनता) खिलाफ इस्तेमाल किया है लेकिन हम जानते है की आप निर्जीव नहीं सजीव है हमारे अंग है हम पर लाठी या गोली चलाने के बाद भले ही तानाशाही जस्न मनाये, पर घर जाकर आपने माँ की टूटी हड्डिया देख कर आंसू रोक नहीं पाए होगे, बाप का फुटा सर देख कर दिल चीख उठा होगा, भाई की लाश देख कर पागल हो गए होगे और फिर आत्मा की आवाज नहीं दबा पाए, परिणामस्वरूप पुलिस और सेनाओ में होने वाले बिद्रोह को इतिहाश देखा है, ख़ैर आगे हम आपके विवेक पर छोड़ते है इस धर्मयुद्ध में आप अपनी भूमिका खुद तय करे हा इतना जरुर कहेगे की भारत के संबिधान में भी "आधी रात को सोये हुए माताओ, बहनों, बेटियो, बुजुर्गो, संतो, साधुओ, सन्यासियो पर लाठी और गोली चलाना किन्ही भी परिस्थितियो में जायज है" नहीं लिखा है
५-पांचवा अनुरोध न्यायपालिका से है कि मंदिर के बाद यही वो जगह बची है जहा भ्रष्टाचार रूपी संक्रामक बीमारी के असर से ९०% तक बचा है १०% जिन्हें आप राज्यसभा और लोकसभा में चल रहे महाभियोग के रूप में देखा जा सकता है ख़ैर आम आदमी तो बस न्याय मंदिर में जल रही न्याय कि "लौ" को ही अपना अंतिम सहारा समझता है और आशा ही नहीं बिस्वास भी है कि आप इस "लौ" को बुझने नहीं देगे
६- छठा अनुरोध सुचना तंत्र से है, कि हम जानते है इस धर्मयुद्ध में सबसे ज्यादा धर्म संकट में आप ही होगे एक तरफ आपका दर्शक (आम नागरिक) होगा दूसरी तरफ आपका अन्नदाता (आपका मालिक पूंजीपती), आपकी आत्मा आम आदमी के साथ होगी क्युकि न्याय आम आदमी के साथ होगा लेकिन आपका सरीर नमक के बोझ तले दबा मालिक का साथ देने को मजबूर करेगा और इस अंतर्द्वंद से लड़ते हुए आप क्या करेगे हम आप पे छोड़ते है, हाँ इतना जरुर कहेगे की अब इस देश को एक और गाँधीजी की जरुरत नहीं है "ब्यक्तित्ववाद" के तले आम आदमी का "मुद्दा" दब कर रह जाता है, नया उदहारण ले लीजिये श्री अन्नाहजारे जी के निचे आम आदमी का मुद्दा दबा कर मार डाला आपलोगों ने, अब देश को अन्नाहजारे जी कि दिनचर्या दिखा कर पका रहे है जिसका आम आदमी की समस्याओ से कोई मतलब ही नहीं है ये अलग बात है की येसा करने के लिए आपके मालिको का सक्त निर्देश होगा, फिर भी यदि आप देश हित चाहते है देश भक्त है तो किसी भी ब्यक्ति को मुद्दे से ऊपर उठाने कि कोशिश न करे
७-सातवा सन्देश पूंजीपतियो, देशद्रोहियो, और भ्रष्टाचारियो को (यहाँ अनुरोध शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकता क्युकि कसाई और "गाय" के बिच ये शब्द अपना अर्थ खो चूका होता है) दुनिया का कोई भी तानाशाह हाँथ में देश का झंडा लिए नारे लगाती भीड़ के लहर में खुद को टिका कर रख नहीं पाया है क्युकि बर्दास्त कि हद जिस दिन ख़त्म हो जाती है उस दिन झंडा सर पे और डंडा हाँथ में होता है इतिहास बनते देर नहीं लगती, समय रहते लाचारो, गरीबो, बेचारो, मजदूरो, किसानो, को उनका जायज हक़ छोड़ दे तो ही अच्छा होगा
ॐ जय भारत जय हिंद बन्दे मातरम