मनमोहन मिश्र

मनमोहन मिश्र
"राजनैतिक विश्लेषक"

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

सांसदो कि पगार

जिस देश कि आधी से अधिक जनता बीस रुपये से कम में गुजारा करति है उस देश का नेता ६०० रुपये माहवार से अधिक माँग कर या लेकर ईस देश का, देश कि जनता का, संसद का, प्रत्यछ्य अपमान कर रहा है । ये अलग बात है कि इनके पास कितना धन है, कहां से और कैसे आता है, जनता सब जानति है......

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

hum ajadi nahi

जिस तरह अंग्रेजों ने देश पर हुकूमत करने के लिए भारतियों के हाथों में डंडे थमा दिए और कन्धों पर बंदूक रख दिए उसि तरह वैचारिक तथा सामाजिक दमन के लिए क्रान्तिकारिओं के बढते दबाव को खत्म करने के लिए अंग्रेजों ने कुछ दरबारी, चाटुकार, भारतियों को मिलाकर अपनी हि अध्यछ्ता में संस्थागत दलालों का एक समूह खड़ा कर दिया जो समय समय पर क्रान्तिकारिओं के आजादि कि ओर बढ़ते कदमों को रोकने से लेकर अंग्रेजों के हर मंसूबों को पूरा करने में सहभागि रहे, कालान्तर मे सुबाश चन्द्र बोश जैसे क्रान्तिकारिओं के जीवन कि सौदेबाजि से लेकर भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारिओं कि मौत तक का सौदा बडी बेरहमि और बेसर्मि से किया, आजादि का सपना तो सपना हि रह गया देश का बिभाजन शौगात में मिला अंग्रेजों ने जाते जाते दरबारी, चाटुकार, दलाल भारतियों का एक ऎसा जाल बना दिया कि देश "आजादि के एक दिन" तो क्या "आजादि के एक पल" के लिये तरस गया, लेकिन दलालों ने खूब धन कमाया देश तो नहि बिदेशी बैंको को पाट दिया, अंग्रेज भले हि दूर हो गये पर दलाल अंग्रेजी और एक अंग्रेजन कि जी हुजुरी से खुश हैं, कोशिश मे है कि फिर से ईटलि कि महारानि भारत कि गद्दि सभालें....एक अरब से भि अधिक भारतियों को ईन एक लाख से भि कम दलालों के बारे में सोचना होगा... सुबाश चन्द्र बोश, चन्द्रसेखर आजाद, और भगत सिंह कि अधुरी क्रान्ति को पूरा करना होगा तभि ये देश आजाद होगा...

शनिवार, 7 अगस्त 2010

जिस तरह अंग्रेजों ने देश पर हुकूमत करने के लिए भारतियों के हाथों में डंडे थमा दिए और कन्धों पर बंदूक रख दिए उसि तरह वैचारिक तथा सामाजिक दमन के लिए क्रान्तिकारिओं के बढते दबाव को खत्म करने के लिए अंग्रेजों ने कुछ दरबारी, चाटुकार, भारतियों को मिलाकर अपनी हि अध्यछ्ता में संस्थागत दलालों का एक समूह खड़ा कर दिया जो समय समय पर क्रान्तिकारिओं के आजादि कि ओर बढ़ते कदमों को रोकने से लेकर अंग्रेजों के हर मंसूबों को पूरा करने में सहभागि रहे, कालान्तर मे सुबाश चन्द्र बोश जैसे क्रान्तिकारिओं के जीवन कि सौदेबाजि से लेकर भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारिओं कि मौत तक का सौदा बडी बेरहमि और बेसर्मि से किया, आजादि का सपना तो सपना हि रह गया देश का बिभाजन शौगात में मिला अंग्रेजों ने जाते जाते दरबारी, चाटुकार, दलाल भारतियों का एक ऎसा जाल बना दिया कि देश "आजादि के एक दिन" तो क्या "आजादि के एक पल" के लिये तरस गया, लेकिन दलालों ने खूब धन कमाया देश तो नहि बिदेशी बैंको को पाट दिया, अंग्रेज भले हि दूर हो गये पर दलाल अंग्रेजी और एक अंग्रेजन कि जी हुजुरी से खुश हैं, कोशिश मे है कि फिर से ईटलि कि महारानि भारत कि गद्दि सभालें....
एक अरब से भि अधिक भारतियों को ईन एक लाख से भि कम दलालों के बारे में सोचना होगा... सुबाश चन्द्र बोश, चन्द्रसेखर आजाद, और भगत सिंह कि अधुरी क्रान्ति को पूरा करना होगा तभि ये देश आजाद होगा...